Tuesday, October 22, 2019

महाराष्ट्र, हरियाणा विधानसभा चुनाव में किसको कितनी सीटें?

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में मतदान ख़त्म हो गया है. 21 अक्तूबर को महाराष्ट्र की 288 और हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों पर वोट डाले गए.
मतदान संपन्न होने के साथ ही चुनावी आचार संहिता भी ख़त्म हो गई और न्यूज़ चैनलों के एग्जिट पोल भी सामने आने लगे हैं.
महाराष्ट्र में इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्ज़िट पोल के अनुसार बीजेपी को 109-124 सीटें मिल सकती हैं. वहीं शिवसेना को 57-60 सीटें मिलेंगी. कुल मिलाकर दोनों पार्टियों को 166-194 सीटें मिलेंगी. दूसरी तरफ़ कांग्रेस और उसकी सहयोगी एनसीपी को 72 से 90 सीटें मिल सकती हैं. जबकि अन्य को 22 से 34 सीटें मिलने का अनुमान है.
वहीं टाइम्स नाउ के एग्ज़िट पोल में बीजेपी-शिवसेना को 230 सीटें जबकि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 48 और अन्य को 10 सीटें मिल सकती हैं.
एबीपी-सीवोटर्स के एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ बीजेपी-शिवसेना गठबंधन 288 में से 204 सीटों पर क़ब्जा करेंगी वहीं कांग्रेस-एनसीपी 69 और अन्य 15 सीटों पर परचम लहराएंगे.
टीवी9 मराठी के एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ बीजेपी गठबंधन को 197 सीटें कांग्रेस-एनसीपी को 75 और अन्य को 16 सीटें मिल सकती हैं.
जन की बात के एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ बीजेपी-शिवसेना को 223 कांग्रेस-एनसीपी को 54 और अन्य को 14 सीटें मिलने की उम्मीद है.
सीएनएन न्यूज़ 18 के मुताबिक़ महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना को 243 सीटें मिलेंगी जबकि कांग्रेस-एनसीपी को 41 और अन्य को 4 सीटों से संतोष करना पड़ेगा.
हरियाणा में टाइम्स नाउ के एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ बीजेपी को 90 में से 71 सीटें मिल सकती हैं, वहीं कांग्रेस 11 और अन्य को 8 सीटें मिलने की उम्मीद है.
रिपब्लिक टीवी जन की बात के मुताबिक़ बीजेपी को 57, कांग्रेस को 17 और अन्य को 16 सीटें मिलेंगी.
न्यूज़एक्स के एग्ज़िट पोल में बीजेपी को 77 और कांग्रेस को 11 सीटें जबकि अन्य को 2 सीटों से संतोष करना पड़ेगा.
टीवी9 भारतवर्ष के एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ हरियाणा में बीजेपी को 47, कांग्रेस को 23 और अन्य को 20 सीटें मिलेंगी.
सीएनएन-न्यूज़18 के एग्ज़िट पोल के मुताबिक़ बीजेपी को 75, कांग्रेस को 10 और अन्य को 5 सीटें मिलेंगी.
288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव बीजेपी और शिवसेना साथ मिलकर लड़ रही हैं. बीजेपी 150 सीटों पर और शिवसेना 124 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जबकि बची 14 सीटों पर गठबंधन के अन्य सहयोगियों को मौक़ा दिया गया है. यहां बीजेपी-शिवसेना का सीधा मुक़ाबला कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन से है.
महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल 9 नवंबर को ख़त्म हो रहा है. जबकि 90 सीटों वाली हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल दो नवंबर को ख़त्म हो रहा है.
दोनों राज्यों की विधानसभाओं के लिए 21 अक्तूबर को एक चरण में ही चुनाव सम्पन्न कराए गए हैं और अब 24 अक्तूबर को नतीजे आएंगे.

Thursday, September 19, 2019

क्या सऊदी अरब के लिए ट्रंप ने तालिबान से वार्ता तोड़ी?

पहाड़ों से भरा बेहद ख़ूबसूरत देश अफ़ग़ानिस्तान आधुनिक इतिहास की सबसे भीषण मानव जनित त्रासदी झेल रहा है.
अफ़ग़ानिस्तान में चार दशकों से जारी अस्थिरता और सशस्त्र संघर्ष ने देश के बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है.
हिंसा के कारण बड़ी संख्या में अफ़ग़ान नागरिक विस्थापित हुए हैं और ये सिलसिला आज भी जारी है.
एक समय अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर रहा तालिबान लगातार अफ़ग़ान सरकार, सुरक्षा बलों और नागरिक ठिकानों पर हमला कर रहा है.
हाल ही में बीबीसी की एक पड़ताल में पता चला है कि पिछले महीने अफग़ानिस्तान में हर रोज़ औसतन 74 लोगों की मौत हुई. यह सब
यानी एक ओर तो अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे संघर्ष को ख़त्म करने के रास्ते तलाशे जा रहे थे मगर दूसरी ओर गोलीबारी और बम धमाकों का सिलसिला भी जारी था.
अमरीका और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच दोहा में कई दौर की बातचीत के बाद एक समझौते पर सहमति बनती दिख रही थी मगर अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इस वार्ता से पीछे हटने का ऐलान कर दिया.
कारण बताया- काबुल में हुआ धमाका, जिसमें एक अमरीकी सैनिक समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी.
उस समय हुआ जब तालिबान और अमरीका के बीच शांति वार्ता चल रही थी.
सवाल उठता है कि वार्ता के दौरान भी तालिबान लगातार हमले कर रहा था और पिछले एक साल में अफ़ग़ानिस्तान में और भी अमरीकी सैनिकों की मौत हुई थी. फिर समझौते से पीछे हटने की वजह क्या वाक़ई वो है, जो ट्रंप बता रहे हैं?
अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान से जुड़े मामलों की गहरी समझ रखने वाले पाकिस्तान में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार रहीमुल्ला यूसुफ़ज़ई मानते हैं कि ट्रंप प्रशासन में ही सहमति नहीं थी कि समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं या नहीं.
वो कहते हैं, "ऐसी रिपोर्ट्स आई थीं कि वहां सरकार के अलग-अलग अंगों, जैसे कि सीआईए और पेंटागन में लोग संतुष्ट नहीं थे. अमरीका ने तालिबान की यह शर्त मान ली थी कि वार्ता में अफ़ग़ान सरकार को शामिल नहीं करना है. एक वजह तो ये हो सकती है. दूसरी बात यह है कि 15 महीने की वार्ता में अमरीका वह हासिल नहीं कर सका, जिसकी उसे उम्मीद थी."
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और अमरीका की डेलवेयर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कुछ और भी कारण बताते हैं. उनका मानना है कि समझौते पर दस्तख़त के लिए चुना गया समय भी राजनीतिक दृष्टि से ट्रंप प्रशासन को मुश्किल में डाल सकता था.
प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं, "विश्लेषकों का मानना है कि समझौते की तारीख़ उसी दिन के आसपास पड़ती जब अमरीका पर 2011 में हुए 9/11 हमलों की बरसी थी.
ऐसे में इसी मौक़े पर तालिबान को अमरीका की धरती पर लाना एक पब्लिसिटी डिज़ास्टर हो सकता था. ट्रंप प्रशासन को देरी से इसका अहसास हुआ तो उन्होंने इसे रद्द कर दिया."
दरअसल अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश ही तब किया था जब तालिबान ने 9/11 हमलों के बाद अल-क़ायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को सौंपने से इनकार कर दिया था.
1979 में अफ़ग़ानिस्तान में घुसने वाली सोवियत सेनाएं जब साल 1989 में यहां से हटीं तो अमरीका और पाकिस्तान समर्थित मुजाहिदीनों ने सोवियत संघ के बिठाए शासक नजीबुल्लाह को हटाने की कोशिशें शुरू कर दीं.
इससे अफ़ग़ानिस्तान में भीषण गृह युद्ध का दौर शुरू हो गया था. अराजकता के इस दौर का फ़ायदा मिला पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर उभरे संगठन तालिबान को.
पश्तो भाषा में, तालिबान का मतलब होता है- छात्र. मजहबी तालीम देने से शुरुआत करने वाले तालिबान ने 1996 में काबुल पर नियंत्रण हासिल कर लिया और फिर अफ़ग़ानिस्तान में सख्त इस्लामी क़ानून लागू कर दिए.

Wednesday, July 24, 2019

"डोनल्ड ट्रंप जो सुबह बोलते हैं, शाम तक भूल जाते हैं"

भारत में अमेरिका के राजदूत हरीश श्रींगला ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उस बयान पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है जिसमें ट्रंप ने कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत और पकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की थी.
ये पेशकश ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की मौजूदगी में की थी जिसमें उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हवाले से कहा कि वो ये पेशकश मोदी के सुझाव पर कर रहे हैं.
हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने फ़ौरन इसका खंडन किया और मंगलवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राज्य सभा को संबोधित करते हुए कहा, "मैं पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ़ से अमरीकी राष्ट्रपति से कोई अनुरोध नहीं किया गया. उन्होंने ये भी कहा की भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है कि शिमला समझौता और लाहौर डिक्लेरेशन के हिसाब से कश्मीर के मसले पर भारत और पकिस्तान ही मिलकर फ़ैसला कर सकते हैं."
जयशंकर के बयान से साफ़ है कि कश्मीर के मसले पर भारत ने अपना रुख़ हमेशा से ही स्पष्ट रखा है और वो कभी भी इस मुद्दे पर किसी दूसरे देश की मध्यस्थता के पक्ष में नहीं रहा है. सबसे पहले 2 जुलाई, 1972 में 'शिमला समझौता' हुआ जिसमें ये बात तय हो गयी है. ये भी तय हो गई थी कि दोनों ही देश नियंत्रण रेखा का सम्मान करेंगे.
उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने ट्वीट करके कहा है कि ट्रंप के बयान पर वे भारत की प्रतिक्रिया से हैरान हुए हैं.
फिर वर्ष 1994 में संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना जिसमे पाकिस्तान शासित कश्मीर को भी भारत का अभिन्न अंग मानने का प्रस्ताव था. फिर वर्ष 2014 में भी संसद ने ऐसा ही किया.
ट्रम्प के बयान पर कांग्रेस के नेता शशि थरूर का कहना था कि उनका बयान बेमानी है और इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराना ठीक नहीं.
संसद के बहार पत्रकारों से बात करते हुए वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि ट्रंप को खुद पता नहीं कि वो क्या बोल रहे हैं. इस अंतरराष्ट्रीय विषय को वो ठीक से समझ नहीं पाए. लगता है कि किसी ने उन्हें बताया ही नहीं. ये नामुमकिन है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी को ऐसा कह सकते हैं कि वो भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करे. ऐसा इसलिए क्योंकि ये हमारे देश के पॉलिसी के ही ख़िलाफ़ है. हमें पाकिस्तान से बात करने में कोई कठिनाई नहीं है. हम एक ही भाषा बोलते हैं. इसलिए ये तो हो ही नहीं सकता."
इमेज कॉपीरइट Reuters राज्यसभा में कांग्रेस के नेता मिलिंद देवड़ा ने भी इस मुद्दे को उठाया जिसका जवाब विदेश मंत्री ने दिया.
राजनीतिक मामलों के जानकार भी ट्रंप के बयान को अनजाने में दिया गया या अति उत्साह में दिया गया बयान मानते हैं. समीर शरण विदेश मामलों के एक ऐसे ही जानकार हैं जो कहते हैं कि जिस वक़्त ट्रंप ये बयान दे रहे थे उसी वक़्त वो पाकिस्तान को भी कह रहे थे कि अमरीका ने जो पकिस्तान को 1. 2 ख़रब डॉलर दिए उनसे पकिस्तान ने कुछ भी नहीं किया.
"उन्होंने इमरान ख़ान के सामने भी उनके देश की आलोचना की. यहाँ तक कहा कि पाकिस्तान तोड़ फोड़ करने वाला देश है. इतने पर भी इमरान ख़ान वहीं बैठे रहे. वो उठ कर नहीं चले गए.''
हालांकि समीर शरण कहते हैं कि ट्रंप एक बड़े देश के नेता हैं और उन्हें पूरा हक़ है अपनी बात कहने का. लेकिन फ़ौरन भारत के खंडन ने बात को वहीं ख़त्म कर दिया.
पूर्व राजनयिक रहे राजीव डोगरा कहते हैं कि इस पूरे विवाद के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा दिया गया बयान काफ़ी महत्वपूर्ण है जो सारे विवादों को देता है. "विदेश मंत्री ने साफ़ साफ़ कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री ने ऐसा कोई अनुरोध ट्रंप से नहीं किया है जो काफ़ी महत्वपूर्ण है. वैसे भी राष्ट्रपति ट्रंप का ये भी रिकार्ड है कि जो वो सुबह बोलते हैं वो शाम तक भूल भी जाते हैं. वो कुछ भी बोलते हैं.
जानकारों को ये भी लगता है कि ट्रंप का बयान किसी दबाव में भी नहीं दिया गया होगा क्योंकि अमरीका किसी दबाव में आ ही नहीं सकता. मगर उनके बयान ने भारत में ज़रूर विपक्ष को कुछ बोलने का मुद्दा ज़रूर दिया जो चल नहीं पाया क्योंकि कांग्रेस के अंदर से हे प्रधानमंत्री के बचाव में स्वर उठने लगे.

Monday, July 1, 2019

المزيد حول هذه القصة

ويقول دان هاغيدورن، مؤلف كتاب حرب المئة ساعة حول هذا النزاع: "كانت هذه الحرب أساسا حول الأرض، فهناك كثير من الناس في مساحة صغيرة وطبقة مسيطرة تشعل النزاع بمساعدة الصحافة."
وكانت حكومة الرئيس السلفادوري، فيدل سانشيز هيرنانديز، تناضل للتعامل مع العدد الكبير من المزارعين العائدين بينما ظل ملاك الأراضي يدفعون باتجاه العمل العسكري، في وقت تحدثت فيه الصحف عن اضطهاد المزارعين من سلفادور في هندوراس ومزاعم عن اغتصاب وقتل.
كانت هذه هي المشاعر قبل مباراة كرة القدم. ويقول الصحفي المكسيكي ريكاردو أوتيرو: "تزامنت تلك الأحداث السياسية مع المباريات، وكرة القدم في أمريكا الجنوبية تحظى بالكثير من الشغف."
ويقول اللاعب رودريغيز: "شعرنا أن علينا واجبا وطنيا هو الفوز من أجل السلفادور، كنا نخشى الخسارة بسبب تلك الظروف، كانت الخسارة تعني عارا أبديا، ما لم ندركه أن ذلك الفوز وذلك الهدف سيكون رمزا للحرب."
في 27 يونيو/حزيران عام 1969 قال وزير داخلية السلفادور، فرانشيسكو خوزيه غويريرو، إن نحو 12 ألف سلفادوري غادروا هندوراس بعد المباراة الثانية. وذكرت صحيفة الغارديان البريطانية حينئذ إنه ألقى باللوم على الاضطهاد الذي عانوه في هندوراس.
وفي اليوم التالي للمباراة ذكر تقرير لوكالة الأنباء الأمريكية يو بي آي تحت عنوان "السلفادور تنتصر في حرب كرة القدم" أن نحو 1700 من رجال الأمن في المكسيك حضروا المباراة للسيطرة على الموقف في ما كان المشجعون السلفادوريون يهتفون "قتلة، قتلة".
ويقول رودريغيز: "يرى الناس أن الهدف أشعل الحرب، في الواقع كانت الحرب ستندلع بالهدف أو بدونه."
وفي الأيام التالية وقعت مناوشات حدودية. وفي 14 يوليو/تموز أمرت حكومة السلفادور قواتها بغزو هندوراس وشن غارات جوية ضدها.
وقال هاغيدورن، الذي كان ضمن القوات الأمريكية في منطقة خليج بنما: "كان بجانبي جهاز إرسال، وفي ذلك اليوم ارتفع صوت الجهاز، وتدفقت البرقيات، لقد قامت قوات السلفادور بغزو هندوراس."
وكان الصحفي البولندي، ريزارد كابوشينسكي، واحدا من قليل من الصحفيين الأجانب في المنطقة حينئذ، وقد بث أول التقارير عن تلك الحرب من تيغيوسيغالبا في تلك الليلة وقد استخدم جهاز الارسال الوحيد في البلاد في ذلك الوقت بعد بحث الرئيس لوبيز أريلاندو الموقف مع السفير الأمريكي.
ووصف كابوشينسكي لاحقا في مذكراته عام 1978 تلك الحرب بأنها حرب كرة القدم، ويتذكر أنه شاهد كتابات على الحيطان تقول: " لا أحد يهزم هندوراس، سوف ننتقم 3 مقابل لا شيء."
وكانت منظمة الدول الأمريكية قد نجحت في التوصل لوقف لإطلاق النار في 18 يوليو/تموز لتنهي حربا أسفرت عن مقتل 3 آلاف شخص أغلبهم من المدنيين من هندوراس، كما شُرد كثيرون في القتال. وقد سحبت السلفادور قواتها تحت الضغط الدولي في أغسطس/آب من ذلك العام.
ولكن الألم لم ينته فالتجارة بين البلدين توقفت لعقود والحدود أغلقت.
وقالت الدكتورة مو هومي ، الأستاذة بجامعة غلاسغو، إن تلك المشاكل المحلية التي أدت لاندلاع حرب كرة القدم، وهي سيطرة نخبة إقطاعية على أغلب الأراضي، استمرت لعقود، مشيرة إلى أن تلك الأسباب كانت وراء الحرب الأهلية في السلفادور بين عامي 1979 و1992.
ومازال التوتر مستمرا بين البلدين، ومازالت النزاعات الحدودية متواصلة بينهما حتى اليوم.
ويقول رودريغيز البالغ من العمر 73 عاما: "بالنسبة لي سيظل ذلك الهدف دائما مصدرا للفخر، لقد استخدمت السلطات والسياسيون نصرنا الرياضي لتمجيد صورة السلفادور."
وأضاف قائلا: "ورغم كل ما حدث بعد ذلك فقد ظل فريق السلفادور يحمل الكثير من التقدير والاحترام لفريق هندوراس المنافس، فلم تكن المباراة بالنسبة لنا بين عدوين بل بين فريقين رياضيين متنافسين."

Tuesday, June 18, 2019

پاکستان، انڈیا اور ورلڈ کپ 2019: اولڈ ٹریفرڈ سے ہم نے کیا سیکھا؟

اس بات میں قطعی طور پر کوئی شک نہیں ہے کہ انڈین کرکٹ ٹیم دنیا کی بہترین ٹیموں میں سے ایک ہے اور پاکستان اس کے مقابلے میں کہیں زیادہ کمزور۔ اگر یقین نہ آئے تو عالمی کرکٹ کی درجہ بندی اٹھا کر دیکھ لیں۔
لیکن کیا وجہ ہے کہ جب بھی کسی عالمی ٹورنامنٹ میں پاکستان کا انڈیا سے مقابلہ ہوتا ہے تو امید کی ایک رمق روشن ہو جاتی ہے اور دل کرتا ہے کہ کوئی معجزہ ہو جائے اور پاکستان انڈیا کو شکست دے دے۔ یہی امید پاکستانی شائقین کو ورلڈ کپ میں 16 جون کے مقابلے سے بھی تھی۔
اس امید کی شاید وجہ انگلینڈ میں ان دونوں ٹیموں کے درمیان ہونے والے آخری مقابلے کے نتیجے سے تھی جب جون 2017 می
لیکن شاید شائقین یہ بھول گئے کہ پاکستان نے آئی سی سی مقابلوں میں انڈیا کی ٹیم کا 11 مرتبہ سامنا کیا اور جیت صرف تین بار ان کے مقدر میں آئی ہے۔ آسٹریلیا میں ہونے والے 2015 کے ورلڈ کپ کے بعد سے ان دونوں ٹیموں نے چار میچ کھیلے اور ان میں سے تین میں پاکستان کو شکست نصیب ہوئی۔
اولڈ ٹریفرڈ کے میچ سے قبل ان دونوں ٹیموں کا سامنا آخری دفعہ گذشتہ سال ستمبر میں ایشیا کپ کے دوران ہوا تھا جب انڈیا نے دونوں میچوں میں پاکستان کو بری طرح شکست دی تھی اور ماضی کے چھ ورلڈ کپ مقابلوں کی طرح اس بار بھی جیت انڈیا کے نام ہوئی جنھوں نے 89 رنز سے میچ جیت لیا۔
تو سوال پیدا ہوتا ہے کہ مسلسل شکست کھانے کے باوجود پاکستانی کرکٹ ٹیم کی مینیجمنٹ کی حکمت عملی میں ایسی کیا کمی بیشی ہے جس کی وجہ سے وہ انڈیا کا مقابلہ نہیں کر پا رہے۔ اس حوالے سے ہم نے ان چند نکات پر روشنی ڈالی ہے جو اولڈ ٹریفرڈ میں پاکستان کی شکست کا باعث بنے۔
انڈیا کی جانب سے وراٹ کوہلی نے ٹیسٹ ٹیم کی قیادت 2014 اور پھر ایک روزہ ٹیم کی قیادت 2017 میں سنبھالی اور کوچنگ کا فرائض روی شاستری ادا کر رہے ہیں۔
اس اثنا میں جب جب ان کی ٹیم کا سامنا پاکستان سے ہوا ہے انھوں نے ہر بار اس بات پر زور دیا ہے کہ ان کی ٹیم پاکستان کے خلاف کسی خاص سوچ سے میدان میں نہیں اترتی اور اس کے لیے وہی تیاری کرتی ہے جو وہ ہر دوسری ٹیم کے لیے کرتی ہے۔
دوسری جانب 2017 سے ایک روزہ کرکٹ میں پاکستان کی قیادت کرنے والے سرفراز احمد نے انڈیا سے ہونے والے ہر مقابلے سے قبل کہا کہ یہ ان کی ٹیم کے لیے سب سے خاص میچ ہوتا ہے اور ان کی پوری کوشش ہوتی ہے کہ وہ اپنے روایتی حریف کو شکست دیں۔
اس سے ظاہر ہوتا ہے کہ میچ سے قبل ہی پاکستانی ٹیم اپنی معمول کی تیاری سے ہٹ جاتی ہے اور کھلاڑیوں پر ضرورت سے زیادہ دباؤ آجاتا ہے۔ اس بات کا اندازہ کوچ مکی آرتھر کے انٹرویو سے لگایا جا سکتا ہے جنھوں نے اس میچ سے قبل کہا تھا کہ انڈیا کے مقابلے میں اچھا کھیلنے والا 'ہیرو' بن جائے گا۔
اس قسم کے دباؤ کے علاوہ اگر پاکستانی ٹیم کی تیاری کو پرکھا جائے تو یہ صاف ظاہر ہے کہ انھوں نے اپنی بہترین ٹیم میدان میں نہیں اتاری۔ اس کی سب سے بڑی مثال شعیب ملک کی مسلسل ٹیم میں شمولیت ہے جن کی ناقص ترین کارکردگی ٹیم پر بوجھ بنی ہوئی ہے۔
اعداد و شمار اٹھا کر دیکھیں تو نظر آتا ہے کہ وہ تمام بلے باز جنھوں نے انگلینڈ میں 20 سے زیادہ اننگز کھیلی ہوں ان میں کم ترین اوسط رکھنے والے چوتھے نمبر کے کھلاڑی شعیب ملک ہیں جن کی اوسط صرف 13.07 ہے۔
اس کے علاوہ گذشتہ دس سالوں میں انڈیا کے خلاف بھی انھوں نے نو میچوں میں ایک نصف سنچری کے ساتھ 28 کی اوسط رکھی ہے اور اسی عرصے میں انگلینڈ کے میدانوں میں انڈیا کے خلاف چار میچ کھیلے اور صرف 44 رنز بنائے اور ان کی اوسط 11 رنز رہی۔
اس کے علاوہ انڈیا کے میچ سے قبل بھی شعیب ملک نے ورلڈ کپ کے دو میچوں میں صرف آٹھ رنز بنائے تھے۔
گو کہ یہ بات روز روشن کی طرح عیاں تھی کہ شعیب ملک کی ٹیم میں کوئی جگہ نہیں بنتی تھی لیکن کپتان سرفراز اور کوچ آرتھر نے متعدد بار کہا کہ انھیں شعیب ملک کی خدمات چاہیے۔
اس کے بعد اگر بولنگ پر نظر ڈالیں تو نظر آتا ہے کہ انڈین بلے بازوں کے خلاف پاکستانی سپنرز کی نہیں چلتی۔
سال 2011 سے لے کر اب تک انڈیا کے سب سے خطرناک بلے باز وراٹ کوہلی، روہت شرما، مہندر دھونی اور ہاردک پانڈیا کے خلاف پاکستانی سپنرز نے 639 گیندیں کرائی تھی اور صرف دو وکٹ حاصل کی۔
اس کے باوجود وہ اولڈ ٹریفرڈ کے میدان پر عماد اور شاداب کے علاوہ حفیظ اور شعیب ملک کے ساتھ اترے۔
پاکستان کے وزیر اعظم عمران خان نے میچ کے شروع ہونے سے قبل ٹویٹس میں کپتان سرفراز کو مشورہ دیا تھا کہ اگر پچ نم نہ ہو تو وہ ٹاس جیت کر پہلے بیٹنگ کریں۔ لیکن ابر آلود موسم اور دوپہر میں تیز بارش کے خدشے کے باعث کپتان سرفراز نے ٹاس جیت کر پہلے بولنگ کا فیصلہ کیا۔
وکٹ کی کنڈیشن کو دیکھتے ہوئے شاید اس فیصلے پر اعتراض کرنا مناسب نہیں ہوگا لیکن اس کے بعد جو کارکردگی پاکستان کے بولرز نے، ماسوائے محمد عامر کے، دکھائی اس پر جتنی تنقید کی جائے وہ کم ہوگی۔
آسٹریلیا کے خلاف میچ میں بھی پاکستان نے نم پچ اور بادلوں کی موجودگی دیکھتے ہوئے بولنگ کا فیصلہ کیا تھا لیکن شاہین آفریدی نے انتہائی ناقص گیندیں کرائی تھیں۔ اور یہی سلسلہ انڈیا کے میچ میں حسن علی نے بھی جاری رکھا۔
کرک وز نامی ویب سائٹ جو اعداد و شمار کی مدد سے کھیل پر تبصرہ پیش کرتی ہے، ان کی تحقیق کے مطابق حسن علی نے 53 ایک روزہ میچوں میں سے صرف 10 میں بولنگ کا آغاز کیا ہے۔
حسن کو ایک اہم ترین میچ میں نئی بال دینا، جب ان کی ورلڈ کپ کی فارم نہایت خراب تھی، ایک برا فیصلہ تھا۔
سال 2019 میں حسن علی نے 12 میچوں میں تقریباً 90 رنز کی اوسط سے سات وکٹیں حاصل کی تھیں جبکہ ورلڈ کپ میں انھوں نے تین میچوں میں 172 رنز کی اوسط سے ایک کھلاڑی کو آؤٹ کیا تھا۔
نتیجتاً انڈیا کے خلاف بھی ان کی خراب فارم کا سلسلہ جاری رہا اور انھوں نے نو اوورز میں 84 رنز دیے اور جس کی وجہ سے محمد عامر کی تمام تر محنت پر پانی پڑ گیا۔
گو کہ عماد وسیم نے قدرے بہتر بولنگ کی اور اپنے دس اوورز میں 49 رنز دیے لیکن شاداب خان، حفیظ اور شعیب ملک نے مجموعی طور پر 11 اوورز کرائے اور 83 رنز دیے مگر کوئی وکٹ حاصل نہ کر سکے۔ وہ بھی ایک ایسے میدان میں جسے انگلینڈ میں سپن کرنے کے لیے سب سے آزمودہ سمجھا جاتا ہے۔
دوسری جانب جب انڈیا نے بولنگ شروع کی تو پہلے جسپریت بمراہ اور بھونیشور نے پہلے چار اوورز میں ہی پاکستان کی پوری اننگز سے زیادہ گیند سوئنگ کی۔
انڈیا کے چاروں فاسٹ بولرز، بمراہ، بھونیشور جو انجرڈ ہو کے چلے گئے تھے، ہاردک پانڈیا اور وجے شنکر نے پاکستان کے مقابلے میں نئی گیند سے کافی بہتر بولنگ کی اور صرف 22 فیصد گیندیں آف سٹمپ سے باہر پھینکیں جبکہ ان کی لینتھ بھی پاکستان کے مقابلے میں وکٹوں کے کہیں زیادہ قریب تھی۔
اور سپنرز کی بات کیا ہی کی جائے۔
جب بابر اور فخر پاکستان کو ایک بہتر سکور کی جانب لے جا رہے تھے تو پاکستان کو کچھ امید بن گئی تھی۔ 11 اوورز سے 20 اوورز کے کھیل کے دوران پاکستان نے انڈیا کے 43 رنز کے مقابلے میں 49 رنز کیے اور کوئی وکٹ نہیں کھوئی۔
لیکن اگلے دس اوورز میں کلدیپ یادیو نے تہلکہ خیز بولنگ کرتے ہوئے پاکستان کے دونوں سیٹ بلے بازوں کو آؤٹ کر دیا اور جہاں انڈیا نے 21 سے 30 اوورز میں بغیر کسی نقصان کے 60 رنز بنائے تھے، پاکستان نے صرف 45 رنز کے عوض چار وکٹیں گنوا دیں۔
اس کارکردگی کی سب سے اہم وجہ بات کلدیپ یادیو کی گیندیں تھی۔ خاص طور پر انھوں نے بابر اعظم کو جس گیند پر آؤٹ کیا اسے روکنا تقریباً ناممکن تھا۔
کرک وز نے کلدیپ کے اُس اوور کا جائزہ لیتے ہوئے بتایا کہ انھوں نے آؤٹ کرنے والی گیند سے پہلے والی گیند صرف 74 کلومیٹر فی گھنٹہ کی رفتار سے لیگ سٹمپ سے باہر کرائی لیکن اگلی گیند انھوں نے 78 کلومیٹر کی رفتار سے بابر کی آف سٹمپ کے باہر پھینکی جو انتہائی سرعت سے سپن ہوئی اور بابر کے بلے اور پیڈ کے درمیان سے ہوتے ہوئے وکٹوں سے جا ٹکرائی۔
ں اوول کے میدان میں پاکستان نے انڈیا کو چیمپئینز ٹرافی کے فائنل میں باآسانی 180 رنز سے شکست دے دی تھی۔

Tuesday, June 11, 2019

解振华:“我们不会改主意,也不重新谈判”

9月9日,国际气候会谈在曼谷落下帷幕,未能就《巴黎协定》的实施细则取得实质性进展。一周后,中国气候变化首席代表解振华重申了各国在2018年12月最后期限之前敲定细则的承诺。

中国气候变化事务特别代表解振华上周在旧金山举行的全球气候行动峰会上告诉记者,各国已经达成共识,对2015年巴黎会谈上达成的气候目标“不会改主意,不会重新谈判”。

“大多数国家——除了极少数——都表现出了灵活性和强烈的政治意愿,”解振华说。“我们一致同意,我们只能从《巴黎协定》出发向前走,不会倒退,不会重新考虑已经达成共识的问题,”他补充道。

9月4至9日,联合国气候会谈在泰国曼谷举行,与会的发展中国家和发达国家就各国设定国家温室气体减排目标的雄心持不同意见。

中国和其他发展中国家一起,要求谈判文本允许一些国家作出自愿而非强制性的承诺。这遭到了以美国为首、包括加拿大和澳大利亚在内的“伞形集团”的反对。

解振华没有指名道姓,只表示曼谷气候会谈期间,某些国家不顾全球去碳化这一“不可逆转的趋势”,立场“令人失望”。

解振华暗指的可能是特朗普政府,特朗普政府计划美国在2020年正式退出《气候协定》,并一直试图为国内日渐消沉的煤炭行业提供补贴,以及下调车辆排放标准。

尽管陷入僵局,解振华确信合作终将取得胜利。各国已经缩小分歧,并将谈判文件的篇幅缩减至约250页,以简化这一过程。

揭开旧伤疤

布鲁金斯学会资深研究员、2016年以前一直担任奥巴马政府气候特使的托德·斯特恩说,特朗普政府在全球气候谈判中缺乏政治参与,“让事情变得非常困难”。

斯特恩说,奥巴马政府曾经展现出的协调全球最大的两个碳污染国之间分歧的善意如今消失殆尽。

“我所说的我们曾经合作良好,并不意味着这个过程中没有冲突和争辩,也不意味着意见完全一致…我们知道大家都试图以一种不会越过红线的方式共同努力。”斯特恩说。

“最终——也许会花上很长时间——我们会找到办法的,”他还说。

能源基金会北京办事处总裁邹骥也认为,特朗普政府对气候谈判不合作的态度,让美国成为国际谈判的“负担”。

美国不合作,还提一大堆要求,”他说。

斯特恩说,他如果参加曼谷谈判,也会反对发展中国家和发达国家采取不同规则的议案。

”这恰恰越过了红线,”他说,“这么做就是重新协商巴黎峰会已经确定的问题。”

2018年12月,《联合国气候变化框架公约》第二十四次缔约方会议将在波兰卡托维兹举行。斯特恩说,在这一最后期限之前,各国还有足够时间来克服这一症结。

解振华认为,谈判进行到现阶段,各国提出“高要求”是正常的。他还说,谈判不是一场零和博弈,每个国家最终必须做出妥协。

“我们的目标是保护人类共同的未来,”他说,“然后守住各(成员)国的利益和红线。”

Friday, May 31, 2019

رولا الطبش: جدل بسبب شرب النائبة اللبنانية السنية القهوة في نهار رمضان

وظهرت الطبش، أمام وسائل الإعلام أثناء تقديم العزاء برحيل البطريرك مار نصرالله بطرس صفير من الصرح البطريركي في بكركي (البطريركية الانطاكية السريانية المارونية) وهي تشرب القهوة في نهار رمضان.
وانتشرت صورة النائبة بشكل كبير عبر مواقع التواصل الاجتماعي في لبنان، واختلفت وجهات النظر والآراء حولها.
واعتبر عدد من مستخدمي مواقع التواصل أن من واجب النائبة، التي تمثل الطائفة السنية في البرلمان اللبناني، أن تحترم حرمة شهر رمضان بغض النظر من موقفها من الصيام.
فقال وسام الديك: "رولا الطبش انتخبت عن المقعد السني بالبرلمان وليس عن المقعد العلماني. صحيح هي حرة أن تصوم أو أن تفطر ولكن يجب عليها أن تستتر كما أمر الله وأن تحترم حرمة هالشهر والناس التي أوصلتها إلى البرلمان والناس اللي عّم ينتقدوا لهم الحق أن ينتقدوا لم نكون ببلد علماني مش ببلد طائفي".
وفي رد على تغريدة مدافعة عن الطبش، قال عادل عبد الكريم مراد: "هلق ربنا سبحانه وتعالى لم يفرض قصاص دنيوي  على من لا يصوم ولكن مثل ما بتعرفي عنا في لبنان نظام طائفي وهذه الطبش تمثل طائفة معينة في البرلمان بقى كان لازم تحترم مشاعر الناس يلي بتمثلهم ولكن إذا ما احترمت أمر ربها سبحانه بدها تحترم أهل السنة التي تمثلهم في البرلمان".
وخلص وسام إلى القول: "للأسف أصبح اختيار آل الحريري للمرشحين خاطئ على عكس سياسة الحريري الأب. بالأمس أخطاء من ديما جمالي واليوم رولا الطبش. نحن مع تمثيل المرأة بدون أدنى شك ولكن هناك سيدات سنية موزونة ومرموقة. هذه الممارسات تدل على انتهاء السياسة الحريرية وحبه من شارعه".
وفي المقابل رفض آخرون الحملة التي تعرضت لها النائبة رولا الطبش، فقالت الإعلامية اللبنانية ديما صادق على حسابها على تويتر: "بدك تحاسب النائب اللي انتخبته حاسبه على أدائه التشريعي، على إذا نفذ وعوده الانتخابية. حياته وطقوسه الشخصية ما حدا اله معها! وإذا أنت منتخبها لتطبيق شريعة السنة فكنت ما تنتخبها من الأول لإنها مش محجبة، مش الحجاب فريضة؟ الدين شأن خاص! كل التضامن مع رولا الطبش".
وقالت فاطمة أرجا: "لما الشعب بيعرف يحاسب المسؤول عن مشاريعه الإنمائية بس وقتا منقدر نبني بلد، خلصونا من هالجدل البزنطي لأن ما حدا بيتحاسب عن حدا كل إنسان دينه لنفسه، للتذكير، إنتخبتوها لتمثلكن سياسيا وليس دينيا".
وعلقت جيني على الحملة بالقول: "صائمة أو فاطرة هي حرّة وهيدا قرار شخصي".
ولم تكن هذه المرة الأولى التي تثير فيها النائبة رولا الطبش الجدل عبر مواقع التواصل الاجتماعي في لبنان.
فقد تعرضت الطبش في وقت سابق لانتقادات واسعة بعد مشاركتها في طقس مسيحي أثناء حضورها قداسا للمحبة والسلام في بيروت.
ولم يكن دخول جارودي الكنيسة ما أثار غضب الناشطين عبر مواقع التواصل في ذلك الوقت، والذين رأوا أنّ من الطبيعي مشاركة المسلمين للمسيحيين في مناسبات اجتماعيّة، ومشاركة المسيحيين للمسلمين في مناسباتهم الخاصة.
لكنّ الأمر المفاجئ بالنسبة لهم هو تقدم الطبش إلى الكاهن، لكن الكاهن لم يناولها القربان بل اكتفى بوضع الكأس على رأسها، علمًا أنّ هذا الأمر من الطقوس التي يتبعها المسيحيون حصرًا.
أفردت الكثير من الصحف العربية بنسختيها الورقية والإلكترونية مساحات واسعة في مقالات الرأي لمناقشة الأعمال الدرامية التي يقدمها النجوم العرب في شهر رمضان الكريم.
وبينما انشغل بعض المعلقين بتصنيف المسلسلات بحسب نسب المشاهدة، اتهم آخرون بعض الأعمال بـ "السرقة الأدبية" و"الترويج للتشبيح".
ناقش الكاتب تامر عبد الحميد في صحيفة الاتحاد الإماراتية الاتهامات الموجهة من مستخدمي وسائل التواصل الاجتماعي لعدة مسلسلات، ولاسيما الخليجية، التي تعرض في رمضان.
ويؤكد عبد الحميد أن الحلقات الأولى من مسلسل "العاصوف2" بطولة النجم السعودي ناصر القصبي "لم تنل رضا بعض المتابعين بسبب الرتابة والهدوء"، مضيفاً أن المتابعين على وسائل التواصل الاجتماعي "علقوا على بعض الأخطاء التاريخية من حيث الملابس والديكورات والإكسسوارات، والتي لا تتناسب مع الحقبة التاريخية التي تجري فيها أحداث المسلسل".
كما تناول الكاتب أيضا المسلسل الكويتي "دفعة القاهرة" والذي يتناول قصص مجموعة من الطالبات الكويتيات أثناء فترة دراستهن بالمرحلة الجامعية في مصر مع أول دفعة كويتية إلى القاهرة عام 1956.
كما يؤكد محمد زكريا في اليوم السابع المصرية أن مسلسل "الواد سيد الشحات" بطولة أحمد فهمي يحقق "نجاحاً كبيرا منذ انطلاق عرضه... وبات متصدراً للأعمال الكوميدية ويغرد منفرداً في هذا العام".
ويضيف زكريا: "أحمد فهمى كعادته اختار فكرة كوميدية خارج الصندوق... وحقق نجاحاً كبيراً متفوقاَ على العديد من المسلسلات الكوميدية التي تم عرضها في نفس الموسم والذى شهد تواجد العديد من نجوم الكوميديا الكبار".
وتشير زينب حاوي في الأخبار اللبنانية إلى الإحصاءات التي صدرت مؤخراً حول المسلسلات التي تتصدر نسب المشاهدة في العالم العربي.
وفيما يخص الأعمال الدرامية اللبنانية، تؤكد حاوي أن هذه الإحصاءات تشير إلى "تصدّر كل من 'الباشا' (كتابة رازي وردة، اخراج عاطف كيوان)، و'آخر الليل' (قصة ديمتري ملكي ــ معالجة درامية عبير صيّاح ــ إخراج أسامة الحمد)، و'دقيقة صمت' (كتابة سامر رضوان، وإخراج شوقي الماجري)" لقائمة نسب المشاهدة الرمضانية في لبنان.
وفيما يتعلق بعدد التغريدات وأرقام الهاشتاغات الخاصة بمسلسلات رمضان، تؤكد حاوي أنه طبقا لأرقام برنامج المشهدية الذي يذاع على شاشة الميادين اللبنانية "تصدرّ كل من 'خمسة ونص '، تلاه 'الهيبة'، و'الحصاد'، ثم 'الكاتب' و'دقيقة صمت'."
تحت هذا العنوان، كتب نذير رضا في المدن اللبنانية ينتقد الحضور الواضح للغة العنف والبلطجة في مسلسل 'خمسة ونص' من بطولة نادين نسيب نجيم وقصيّ خولي، إذ يقول: " تلك 'الطبخة' من الحراس، واستعراض القوة، و'التشبيح' والسيارات بزجاج داكن، تنسف المبدأ الأساسي بفكرة حضور الدولة، ووجودها كمرجعية قانونية وضابطة أمنية للإخلال بالقانون، والموكلة تحصيل الحقوق الفردية وردع المخلين".